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मानकों को ध्वस्त करते मोदी।

संतोष पाठक
राजनीतिज्ञ एवं 
अध्यक्ष, CSRA  
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ रीजनल एस्पिरेशन्स ने लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार के लगभग सभी निर्वाचन क्षेत्रों का अध्ययन किया था और हमारे फेसबुक पेज के माध्यम से एनडीए तथा महागठबंधन के जीत-हार की सम्भावनाओ का विश्लेषण किया था। अब जब परिणाम हमारे सामने हैं तब उसका समग्र आंकलन करने के बाद हम मोदी की इन विराट जीत के कारको का विश्लेषण लिख रहे हैं।
यह जीत भारतीय राजनीतिक इतिहास में अद्वितीय और असाधारण है, इसलिये इसका विश्लेषण भी सत्यता से अभिप्रमाणित होना चाहिए। मोदी एक साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता से शुरुआत कर देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद तक दूसरी बार पहुंचे हैं, इसलिये भी यह जीत असाधारण है। एक लाइन में अगर कहना हो कि मोदी इतने सफल क्यों हैं तो मैं कह सकता हूँ कि "मोदी ने भारतीय राजनीति के स्थायी तत्व या मानकों को ध्वस्त कर दिया है"। मैं जब राजनीति विज्ञान के छात्र के नाते और चुनाव के अध्ययन शील विद्यार्थी के नाते देखता हूं तो यह जीत कोई पुराने मापदंडों और समीकरणों के विश्लेषण से बिलकुल परे है| ऐसे भी अगर आप एक साधारण व्यक्ति से भी पूछेंगे की भारतीय राजनीति के स्थायी तत्व और मानक बताइये, तो वो कहेगा "जाति, परिवार तथा धर्मनिरपेक्षता"।

ये ऐसी जुगलबंदी थी, जिसे कोई हरा नही सका था। राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, ज्योति बसु और ना जाने कौन कौन, जो परोक्ष अपरोक्ष रूप से इस जुगलबंदी से लड़ते रहे लेकिन यह व्यवस्था बनी रही और धीरे धीरे यह भारतीय राजनीति की पहचान बन गयी। नेहरू इस व्यवस्था के जन्मदाता थे। इसकी चासनी थी समाजवाद तथा साम्यवाद। हालांकि भारत के संदर्भ में अगर देखा जाए तो ये एक एलियन व्यवस्था थी, लेकिन जनता को उसके संकटों का सांकेतिक निराकरण इसी व्यवस्था में दिखा कर इन तीन नासुरों को संदर्भित कर दिया गया। इसके मौलिक लाभार्थी थे, भारतीय ब्यूरोक्रेसी, बौद्धिक वर्ग तथा आज़ादी के लड़ाई में बुद्धिमत्ता से अपनी राजशाही को बचाकर रखने वाले जागीर।

1947 से 1990 का कालखण्ड आज़ादी से अब तक का सबसे काला है अध्याय है|  वस्तुतः समाजवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद तथा जातिवाद के परिपेक्ष्य में परिवार की अवधारणा को मजबूत किया गया है, इसी वजह से कांग्रेस से सीधी लड़ाई लड़ने वाली पीढियों ने भी अंततः वही किया जो कांग्रेस कर रही थी। सर्वसमावेशी कांग्रेस ने अपनी पूंजी जब समाजवादियों में गवाई तब भी एक साधारण भारतीय को वही हांथ लगा। इसी लिए रजनी कोठारी जैसे विद्वानों ने इसे कांग्रेस रूल ना कहके इसे कांग्रेस सिस्टम कहा। इस कांग्रेस सिस्टम का आधार "समाजवाद, धर्मनिरपेक्षतवाद तथा जातिवाद ही था और इसी आधार पर उन्होंने परिवारों के शासन को स्थापित किया है।

मोदी पहले नेता दिखाई पड़ रहे हैं जिन्होंने भारतीय राजनीति के स्थायीवाद यानी कांग्रेस को चुनौती दी, कांग्रेस के प्रकृति के अन्य दलों के जातिवादी व्यवस्था को चुनौती दी और क्रमशः सफल रहे हैं। मोदी एक असाधारण प्रकृति के नेता हैं। अगर अन्य सभी गुणों को दरकिनार भी कर दिया जाय तो उनके जैसा मेहनती प्रवृति का नेता अभी किसी दल में नही दिखाई दे रहा है। चुनाव परिणाम के मूल में अभी उनकी मेहनत, योजनाओं पर सक्रियता, वोटरों के मानस को समझने की क्षमता तथा टीम वर्क की समझ अभी किसी में नही दिखती।

चुनाव पूर्व ही मोदी ने अपने पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के साथ चुनाव की योजनाओं पर सहमति बनाकर, उसको अन्य साथियों में बांटकर जमीन पर उतार दिया। बंगाल में भाजपा की प्रचंड बढ़त इस बात को सत्यापित करती है। जब भाजपा को यह लगा कि उत्तर के राज्यों में कुछ कमी हो सकती है तब 2 साल पूर्व से बंगाल तथा उत्तर-पूर्व के राज्यों में अपनी गस्त बढ़ा दी। राज्यों के प्रभारीयों ने अपना शत प्रतिशत दिया और भाजपा ने जबरदस्त सफलता पाई।

लेकिन जो जीत की सबसे बड़ी वजह है उनका विश्लेषण और महत्वपूर्ण है। मोदी, जैसा मैंने पहले कहा प्रवृति से मेहनती हैं, यह दिखता है उनके योजनाओं की सफलता से। बिहार जैसे अत्यंत पिछड़े राज्य में अफसरशाही इतनी हावी है कि बिना घूसकांड के आप जमीन पर सफल ही नही हो सकते, वहां उन्होंने जबरदस्त सफलता पाई है। जातिवाद, परिवारवाद तथा धर्मनिरपेक्षतावाद तीनों रोगों से ग्रसित बिहार में जो सफलता मोदी ने पाई है वह असाधारण है।

चुनाव के दौरान जब हमने सीटों का अध्ययन शुरू किया तो हमने हरेक जिले से 5 प्रमुख योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या का अध्ययन किया था। उनका आंकड़ा विस्तारित तौर पर तो यहां लिखना मुश्किल है, लेकिन उसकी प्रमुख बातों को मैं यहां रखना चाहता हूं।

उज्ज्वला योजना के औसतन लाभार्थियों की संख्या 2.75 लाख से 3.25 लाख की है। स्वच्छता अभियान के तहत बने शौचालयों के लाभार्थियों की संख्या औसतन 6 से 7 लाख तक की है। प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों की संख्या एक जिले में 20 से 25 हज़ार तक की है। आयुष्मान योजना के लाभार्थियों की संख्या 7 से 10 हज़ार तक की है जबकी 2.5 से लेकर 3.2 लाख तक के लोग इस योजना के तहत रजिस्टर्ड हैं और भविष्य में उसका लाभ लेंगे। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि अभी उतनी प्रचारित नही है लेकिन जिनका भी नाम प्रदेश सरकार ने दिल्ली भेजा था, उनको लाभांश मिला है। खेतों में सिंचाई के लिए खंभे खड़े कर दिए गए हैं और सौभाग्य योजना से घर-घर जगमग है। बिहार में बिजली अब चुनावी मुद्दा नही रह गया है।

कांग्रेस ने भारतीय राजनीतिक संस्कृति में स्थायीवाद का रोपण किया है जिससे मोदी कहते हैं कि मुक्ति पानी है। कांग्रेस मुक्त भारत अभियान का संदर्भ भी यही था। ऐसा नही था कि भारत प्रकृति से चीन बन जाता लेकिन कुछ मुद्दों पर भारतीय आम सहमति बना लेते हैं। विकासवाद मुद्दा पहले भी था और अब ज्यादा प्रासंगिक लगता है। बिहार में एनडीए 1 ने जबरदस्त सफलता पाई थी। 2005 से 2010 के बीच जब बिहार में परिवर्तन दिखने लगा था तब यूं ही बिहार के नागरिकों ने 243 में 223 सीटें एनडीए को दी थी। 30% कि वोट की ताकत वाली राजद 23 सीटों पर सिमट गई थी। मोदी ने विकास का पहिया थामा और अभिजीत हैं।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने 2019 के जनवरी में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आम कार्यकर्त्ताओ को एक बात कही थी कि "आप उदास क्यों होते हो.. आपका नेता 1988 से अभी तक अभिजीत है, जितने भी चुनाव परोक्ष या अपरोक्ष रूप से मोदी जी के नेतृत्व में लड़े गए हैं उनमें किसी मे हार नही हुई"। यह एक कार्यकर्ता के लिए स्पष्ट संदेश था तब जब जातियों के उलझन में जिसमे रोहित वेमुला, भीमा कोरेगांव तथा पटेल आरक्षण का विषय भाजपा को थोड़ा कमजोर दिखा रहा था। भाजपा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में हारकर आई थी। इस वक्तव्य के बाद जो हलचल पैदा हुई वो 23 मई को दिखाई पड़ी और जीत हासिल हुई थी।

सापेक्षता में अगर आंकलन करें तो एक बात साफ हो जाएगी। मोदी साधारण बात करते हैं। स्वच्छता के आग्रह को कांग्रेसी जनों ने नकार दिया। आमिर खान के अतुल्य भारत के प्रचार से सफाई हासिल नही हो सकती थी नही हुई, लेकिन प्रधानमंत्री का झाड़ू उठाकर कूद पड़ने से जरूर फर्क पड़ता है। आज लोग सड़कों पर थूकने से बचते हैं। छोटे और मंझले शहरों में भी सार्वजनिक स्थलों पर शौचालय की व्यवस्था दिखने लगी है। स्टेशन साफ दिखाई पड़ने लगे हैं और लोगों के मानस में भी परिवर्तन दिखाई पड़ती है।

धर्मनिरपेक्षता, जो वास्तव में मुस्लिम तुस्टीकरण का माध्यम बन गया है, उसकी कलई खुल गयी है| कांग्रेस का सिर्फ मुस्लिम इलाकों में जीतना तथा ममता का विघटन इसके उदाहरण हैं। उत्तर भारत, पश्चिमी भारत के राज्यों बड़े राजनीतिक परिवार चुनाव हार चुके हैं। शरद पवार यह कहते पाए जा रहे हैं कि हमारे कार्यकर्ताओ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीखने की जरूरत है। यह दिखाता है कि परिवारवाद भी खात्मे की तरफ है।

उत्तर प्रदेश में बड़े महत्वकांक्षाओं के साथ बड़ी जातीय गठबंधन बनाया गया। सपा-बसपा भी साथ मिलकर भाजपा को रोक नही सके। मायावती-अखिलेश की आपसी टकराव की खबरें मीडिया में छप रही है। यही याथार्त था इसका। यही परिणीति थी।

भारत अब बदल रहा है। समाजवाद और साम्यवाद की लुभावनी बातें अब आम जनता को फॉसिनेट नही करती। आंदोलन, और गुटनिरपेक्ष वाद अब काफ़िर सा महसूस होता है। आम जनता जान गई है कि ये मिथ्या है। आज भारत सपनो की उड़ान उड़ रहा है, सबको अच्छा, व्यवस्थित और सुगम जीवन चाहिये। आर्थिक विकास और प्रगति जो हमने पिछले 20-25 वर्षों में हमने एक देश के नाते हासिल भी किया है सभी को उसमें अपना हिस्सा चाहिए।

मोदी ने नए भारत की कल्पना पेश की है, उसमे युवा अपना खुद का तथा अपने समाज का  समावेश पाना चाहता है। नए भारत की कल्पना समाजवाद की तरह कपोल नही है क्योंकि इनके लिए मेहनत करने वाला नेतृत्व हमें प्राप्त है। आम नागरिक के नाते हमारा भी दायित्व है कि हम सहभागी बने।

अपने द्वितीय पारी के पहले "मन की बात"में मोदी ने जल संचय की उपायों और कार्यक्रमों की घोषणा की है। सरपंचों से लेकर नागरिकों से जल संकट के स्थायी और प्रकृति के साथ सामंजस्य में उपाय खोजने की बात की है। हमें भी इस प्रक्रिया में सहभागी होना पड़ेगा क्योंकि इसमें लाभ हमारा ही है। हमें प्रकृति के योजना के साथ ही चलना पड़ेगा क्योंकि हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके उनके स्वरूप को बदल के अपने उपयोग में ला तो सकते है, लेकिन उसी संसाधन का प्राकृतिक स्वरूप नही बना सकते। जैसे आज मोदी अविजित दिख रहे हैं, वैसे ही प्रकृति हमेशा अविजित होगी।

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