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मोदी और उनके नए समीकरण बनाने की क्षमता


संतोष पाठक, सचिव- CSRA
मोदी और उनके नए समीकरण बनाने की क्षमता

सत्ता के शीर्ष में बैठे हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगभग सत्रह वर्ष बीत गए हैं, तेरह वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री और चार वर्ष भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री के रूप में, लेकिन वह आज भी भारत के सामान्य मतदाताओं को रिझाने में सक्षम हैं। आमतौर पर लोकतंत्र में ऐसा देखने को बहुत कम मिलता है जब एक दशक से ऊपर तक सत्ता के शीर्ष पे बैठने के बाद भी जनता की नाराजगी न झेलनी पड़े जिसे एंटी इंकम्बेंसी के नाम से भी जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी भी उसी अपवाद के एक उदहारण है। उत्तर भारत, पूर्वोत्तर भारत तथा पश्चिमी राज्यों में विजय पताका फहराने के बाद सुदूर दक्षिण प्रांत कर्णाटक के चुनाव परिणामों ने यह साबित किया है की प्रधानमंत्री बनने के पूर्व के चुनावी रैलियों में उनका जो आकर्षण था वह आज भी विद्यमान है और भारत के लगभग सभी प्रांतो के आम मतदाताओं की आस्था उनमे बरकरार है।

हालाँकि २०१९ के चुनावी समर के नजदीक आते ही विपक्षी पार्टिया उग्र हो चुकी है और दिन रात कई मुद्दे पे मोदी सरकार को घेरने का प्रयास कर रही है। रोजगार, नोटबंदी, जीएसटी, अर्थव्यवस्था प्रबंधन, कृषि विकास, पीएफ, इत्यादि के पेंच में फंसे अनेकों अनुत्तरित सवालों के वावजूद मोदी की लोकप्रियता में कुछ ख़ास गिरावट दिखाई नहीं देती, जिसकी कई वजहें हैं। नरेन्द्र मोदी ने स्वयं को गढ़ा है और वह मुख्यतः अन्य प्रमुख दलों के नेताओं की तरह परिवार तथा वंशवाद से निकले हुए सामान्य समीकरणों के नेता नहीं हैं, बल्कि नये भारत के उम्मीदों के प्रतीक सुपर ब्रांड नेता हैं। कांग्रेस ने आज़ादी के बाद जो नेतृत्व खड़ा किया था उसमे धनाढ्य वर्गों से निकलकर राजनीति में आये नेता या उनके सगे सम्बन्धियों का बोलबाला था। धीरे धीरे उनकी चमक फीकी पड रही है और भारत के जीवंत लोकतंत्र ने उनके मुह पर तमाचें मारना शुरू कर दिया है। अधिकांश क्षेत्रिए दलों का भी कांग्रेसीकरन हो चूका है। जो क्षेत्रीय पार्टियाँ कभी कांग्रेस के विरोधाभास और उसके वैकल्पिक राजनीति के आधार पर सत्ता के शीर्ष पर पहुंची थी, आज कमोबेश उनमे भी वंशवाद और भ्र्ष्टाचार घर कर गया है। आज सामान्यतः सभी क्षेत्रीय दलों मे बड़े नेताओं के पुत्रों का बोलबाला है और उनके वोटों का आधार जातीय समीकरण तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर टिका हुआ है, जिसका सबसे प्रिय जुमला धर्मनिरपेक्षता है। वस्तुतः मुलायम सिंह यादव ने जो वोटों का समीकरण सपा के लिए खड़ा किया लगभग उसी पर अखिलेश यादव नेता बने बैठे है। नए मतदाताओं का समूह वो जोड़ नहीं पा रहे और पुराने मतदाता आपसी बैर में बिखर रहे है। ठीक वैसे ही काशीराम ने जाटव वोटों का जो समीकरण बसपा के लिए खड़ा किया, मायावती उसी समीकरण को बचाने की मशक्कत में जुटी हुई हैं। नए समीकरण बनाने की असफलता की वजह से आज दोनों हाशिये पर हैं।  

राजनितिक दलों के वोटों के स्थायी समीकरण को जिस प्रकार मोदी ने चुनौती दी है वही मोदी को आज सबसे अलग करता है मोदी आधुनिक भारत में सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण करने वाले नेता के रूप में उभरें है, और यही आरोप विपक्षी पार्टियाँ प्रधानमंत्री मोदी पे लगाती आयी हैं। वैसे तो आज़ादी के बाद इस देश में धर्म की राजनीति की शुरुवात १९७६ के ४२वे संविधान संसोधन के साथ उधृत हुआ था संविधान के प्रस्तावना मेंधर्मनिरपेक्षशब्द के जोड़े जाने के तुरंत बाद से धर्म राजनीती का केंद्र बन गया धीरे धीरे धार्मिक राजनीति का जहर पुरे देश में फ़ैल गया जिसके भुक्तभोगी अधिकांश जगह पे बहुसंख्यक समाज ही रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत की अनेकों समस्याएं कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय दलों ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण में पोषित किया हुआ है जो अब इस देश की सुरक्षा और एकता के लिए नासूर बन गयी है अपने ऊपर लगे आरोपों के जबाब में जब मोदी विपक्षी दलों परधर्मनिरपेक्षताके गोद में छीप कर अपनी नाकामियों को छुपाने का प्रत्यारोप लगाते हैं, तो ये सारे दल बगले झाँकने लगते हैं। प्रत्युत्तर के आभाव में उनकी कलई युवा और सजग मतदाताओं के सामने खुलने लगती है  आज देखें तो कर्णाटक में मुस्लिम उप मुख्यमंत्री की मांग को इस देश का युवा कैसे देखेगा? क्या इसे वो धर्मनिरपेक्षता मानेगा? जिस तरह से कांग्रेस ने हालियां संपन्न कर्णाटक चुनाव में लिंगायत जाती को हिन्दुओ से अलग कर एक नया अल्पसंख्यक धर्म बनाने की राजनीति की शुरुवात कर दी है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नए प्रकार का काला अध्याय ही है। जब चुनाव ही धर्मनिरपेक्ष नहीं होंगे तो सरकारें कैसे धर्मनिरपेक्ष होंगी? क्या वो मानेगा की कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष दल है जो वेलफेयर स्कीम्स तथा विकास के योजनाओं को लागू करने के दौरान धार्मिक परिधियों से दुरी बना सकती है? राजनीतिज्ञ मोदी ने इस तुस्टीकरण का प्रबल विरोध करते हुए हिन्दू मतदाताओं का एक विशाल समुह विकसित कर लिया है जो जातीय समीकरण के किले को भेद पाने में सफल हो पाया है। इसके अलावा भी नरेन्द्र मोदी ने विकास के मसले पर आम नागरिकों को यह विश्वास दिलाया है की वो एकमात्र ऐसे राजनितिक व्यक्ति हैं और भाजपा एकमात्र ऐसी दल है जो वोटों के समीकरणों से उठ कर उनकी समस्याओं का समाधान दे सकती है। या ऐसे भी कह सकते हैं भाजपा के विचार परिधि में यह मतदाता वर्ग उनको स्वतः मिल गया और उनकी छवि ने उसको और मजबूत करते हुए भाजपा को इस देश में पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक फैला दिया है यह वर्ग वह मजबूत किला है जो हमेशा मोदी के साथ खड़ा रहता है और तत्काल रूप से हर चुनाव में समर्थन को लेकर प्रतिबद्ध है।

प्रधानमंत्री मोदी की इसी लोकप्रियता और उनके राजनितिक कौशल से सभी विपक्षी पार्टियाँ चिन्तित है और हर चुनाव के पहले तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहती है। इसमें सबसे प्रचलित हथकंडा देश में लोकतंत्र को खतरे में बताया जाना है और इसके लिए तरह तरह के माध्यम चुने जाते हैं लेकिन क्या इस देश के आम नागरिकों को लोकतंत्र की मर्यादा मालुम नहीं है? क्या इस देश के आम मतदाताओं को मालुम नहीं की इस देश में मोदी बड़े हैं या लोकतंत्र? क्या मोदी नहीं जानते की किस दिन उनके कदम तानाशाही की तरफ बढ़ेंगे, उनका खुद का दल तथा आरएसएस के स्वयंसेवक समूह कैसी प्रतिक्रिया करेंगे? भाजपा में तो इतनी तीक्ष्ण प्रतिस्पर्धा है की लोग गिध्ह की तरह निगाह लगा कर बैठे हैं की कब मोदी चुनाव हारें और उनको मौका मिले? लेकिन मोदी आम नागरिक, मतदाताओं, तथा अपने कार्यकर्ताओं-समर्थकों को यह समझाने में सफल हैं की यहाँ एक ऐसा वर्ग है जो विश्मय्कारी है और हवाओं के रुख की तरह चोले बदलने में माहिर है वह देशद्रोहियों का ऐसा समूह है जिसका आतंरिक समझौता कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दलों से है उदाहरण के तौर पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घटी ९ फरवरी २०१६ की घटना पर नजर डालें जिसने इस देश के आम नागरिकों को सकते में डाल दिया थाभारत तेरे टुकड़े होंगे इन्साल्लाह-इंसा अल्लाहके नारों के बीच वहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की मौजूदगी ने भी कई प्रश्न खड़े किये थे देश की बर्बादी की इच्छा रखने वाले समूह को कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का समर्थन देश में एक आक्रोश पैदा करने का काम किया और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिला जो किसी भी कीमत पर ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरोध में लड़ती है। ऐसी घटनाओं से मोदी को ताक़त मिलती है और वह अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारधारा को और मजबूती से स्थापित करते हैं एक बड़ा वर्ग जो मोदी की सामान्य नीतियों से खफा भी था वो भी अपना विचार बदल कर भाजपा के साथ खड़ा हो जाता है

मोदी की एक दूसरी ताक़त है की वह अपने फैसले को देश की अस्मिता से जोड़ने में सफल रहते है और उतनी ही कुशलता से उसे आम लोगों तक पहुंचाने में सफल रहते है  और इसमें उनका व्यक्तित्व, उनके द्वारा संपन्न कार्यो का इतिहास और उनका राष्ट्रवाद का प्रथम रखने का अग्रीम नारा उन्हें जनता से सीधा संवाद करते हुए अपने फैसलों के लिए समर्थन जुटाने में सहायक होता है अब चाहे नोटबंदी के पक्ष  में उनके आह्वान को देखे, या डिजिटल इंडिया और उसके बाद सफाई अभियान देखे, हर फैसले में जनता का अपार समर्थन मिलना इसी बात का धोतक है। नोटबंदी का फैसला कमजोर तथा दबे कुचले वर्गों के हीत में लिया गया फैसला बताने से मतदाताओं को लगता है की नोटबंदी बड़े अमीरों के खिलाफ की गई बड़ी कार्यवाही है जिससे उनकी काली कमाई की कमर टूट गई है। ऐसे में फिर कोई मोदी पर कोई सवाल खड़े करता है तो जनता उसे सबक सीखने से बाज नहीं आती स्वच्छ भारत के लिए स्वयं झाड़ू पकड़कर उतरना जनता को प्रेरित करते हुए कार्य को सफल बनाने की जिम्मेवारी का एहसास दिलाती है। व्यवस्था सुधार जनता को जिम्मेवारी बन जाती है अभी तक ध्रुवीकरण को आमलोग सिर्फ जातीय तथा धार्मिक अनुष्ठानों के परिपेक्ष्य में देखते रहे हैं लेकिन मोदी ने अनेकों नए समीकरण भी इसमें जोड़ दिए हैं विकास और व्यवस्था सुधार इसका एक महत्वपूर्ण अंग बन चूका है जिसके पीछे आज का युवा वर्ग गोलबंद है। किसी को आज़ादी के बाद पहली बार शौचालय मिला है, किसी को बिजली तो किसी को रसोई गैस तथा चूल्हा मिला है, और जिनको मिला है वो मोदी के पीछे गोलबंद हो रहे हैं ये देते वक़्त मोदी कहते हैं की ये आपका अधिकार है जो मैं आपको देने आया हूँ यह वह आधार है जिसके वजह से मोदी विकास को एक नयी दिशा और गति देने में सफल रहते है इससे आधुनिक भारत यानए भारतके नारे से प्रभावित बड़ा मतदाता वर्ग स्वतः जुड़ जाता हैं, और ये भी उनकी चुनावी सफलता का मूलमंत्र है 

मोदी स्थाईत्व को चुनौती देने वाले एकमात्र नेता हैं, और वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि स्थाईत्व कांग्रेस के सोच को पोषित करती है मोदी स्वयं को बड़े बदलावों के नेता के रुप में सामने रखते हैं। जब वो नए भारत की बात करते हैं, तब भारतीय जनमानस मोदी की विकास क्रियान्वन में विश्वास व्यक्त करते है उनके नए भारत की बात से जाति तथा धर्म के आवरण में कुम्हलाई हुई भारतीय समाज में नयी दिशा की बात उठती है अब अगर स्वरोजगार के मन्त्र का ही उदहारण ले तो उनके व्यक्त्व ने देश में एक नयी बहस की शुरुवात की। पकौड़ा प्रकरण को अनावश्यक महत्व दे कर विपक्षी पार्टियाँ गुजरात और कर्णाटक चुनाव में गयी, लेकिन जनता ने विपक्षियों के इस मुद्दे को शीरे से नकार दिया। जगजाहिर है की कर्नाटक के चुनवों में भाजपा को गैर पारंपरिक मतदाताओं का भी वोट प्राप्त हुआ है कई विधानसभाओं में भाजपा को मुस्लिम वर्ग का भी वोट मिला है सरकारी नौकरियां मोदी सरकार के लिए आज बड़ी चिंता की वजह है लेकिन सरकारी नौकरियों की भी अपनी सीमा है और जनसँख्या के अनुपात में नौकरियां पैदा करना संभव नहीं है मोदी ने कांग्रेस राज से चली आ रही  मिथ्या को तोड़ने का प्रयास किया है की सरकारी नौकरी ही जीवन में प्रतिष्ठा दिला सकता है यह सच्चाई है की सरकारी नौकरियों के चक्कर में ना जाने कितनी पीढियां बर्बाद हुईं हैं और इसी सोच ने हमें विश्व के कई देशों से आधारभूत टेक्नोलोजी में पीछे कर दिया।मोदी जब नारा देते हैं मेक इन इंडिया, तो आज के नौजवान दुनिया में आ रहे सामाजिक-आर्थिक-टेक्नोलोजी में आ रहे बदलावों को समझते हुए मोदी साथ खड़े हो जाते हैं मोदी समझते हैं की रोजगार की संभावनाओं में प्रगतिनिर्माण के क्षेत्रमें प्रगति किये बिना हासिल नहीं की जा सकती उदारीकरण के दौर में लगभग 16-17 सालों तक कांग्रेस का निर्बाध शासन रहा है लेकिन कोई भी माकूल प्रगति हासिल नहीं की जा सकी मोदी इस लिहाज से भी अपने समकक्षियों ये आगे दिखते हैं

जहाँ तक कांग्रेस की बात है वो अपने पुराने तरीकों से मुक्त होकर सोच नहीं पा रही है जिसका प्रभाव उसके प्रदर्शन पर दिखाई पड रहा है आज का युवा वर्ग समाजवादी विचारधाराओं के मोह जाल में फस नहीं रहा क्योंकि उसे एक अच्छा जीवन चाहिए उदारीकरण के दौर में पैदा हुए नए मतदाता समूह कांग्रेस तथा अन्य समाजवादी नीतियों से प्रभावित नहीं है उसके अपने लक्ष्य हैं, जिसकी सीमा अनंत आकाश है देश में जो भुखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार तथा उनुत्पादाक्ता से जुड़े जो गंभीर प्रश्न है वो निःसंकोच किसी से पूछ बैठता है और जवाब उन्हें मोदी से मिलता है इसलिए वह उनके साथ खड़ा हो जाता है कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व जब देश के अन्दर के समस्याओं पर प्रश्न खड़े करता है तो जवाब उसे भी देना होता है क्योंकि वह भी लम्बे समय तक सत्ता के बड़े भागीदार रहे हैं

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं की मोदी ने अपने पक्ष में कई नए समीकरणों का निर्माण किया है और सारे वर्ग आज भी मोदी में अपनी आस्था बनाये हुए हैं कोई धार्मिक तुस्टीकरण के विरोध में मोदी के साथ है, तो कोई विकास तथा नए भारत के नारों के वजह से। लेकिन निःसंकोच मोदी अभीजित नहीं हैं, उनकी सीमायें हैं और उन्हें भी लोगों के प्रश्नों का जवाब देना है युवा वर्ग भले ही सबसे निर्णायक मतदाता वर्ग है लेकिन कांग्रेस के साथ साथ अन्य सभी दलों का अपना समर्थक वर्ग है, जो उन्हें मत दे रहे हैं लेकिन 2019 के चरम संघर्ष में वह पर्याप्त नही लगता है देश के अन्य राजनितिक दलों को अपने अपने मतदाता वर्ग को सुरक्षित रखना तथा उनके साथ साथ नए वर्गों को जोड़ने का अथक प्रयास करना होगा, तभी वो मोदी की लोकप्रियता के वावजूद उनसे आगे निकलने की सम्भावना बनाते दिखेंगे यह असंभव तो नहीं है लेकिन राहों में कांटे बहुत हैं

Comments

  1. राजनीतिक परिस्थितियों का बेहद सटीक विश्लेषण किया है आपने.

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