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उत्तर कोयल बाँध परियोजना - किसानों की बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार


 शिशु रंजन, (राजनितिक एवं आर्थिक विश्लेषक) एवम
 अजित झा, अर्थशास्त्री एवं सह-प्राध्यापक (ISID)

लगभग ५० वर्ष पहले उत्तर कोयल नदी पर एक बाँध परियोजना का शुभारम्भ हुआ जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है। मात्र ३० करोड़ की लागत का यह प्रोजेक्ट १९७० में शुरू हुआ, पर अब इसका लागत मूल्य लगभग २४०० करोड़ का हो चूका है। २०१९ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना के बाकी बचे कार्य को पूरा करने के लिए शिलान्यास किया है। प्रधानमंत्री के शिलान्यास के बाद बिहार और झारखण्ड के किसानों में एक आशा जगी है की ये बाँध परियोजना जल्दी ही पूरी हो जाएगी और उसके बाद सिचाई की सुविधा मिलने से फसल सूखे की मार से बच पायेगी और उनके आय बढाकर आर्थिक स्तिथि सुदृढ़ करने का काम करेगी।
           उत्तर कोयल नदी तत्कालीन बिहार की रांची पठार से निकलती है जो अब झारखण्ड में पड़ती है। रांची पठार से निकलने के बाद पलामू पठार से गुजरती हुई २६० वर्ग किलोमीटर का रास्ता तय करती है और फिर हैदरनगर के उत्तर-पश्चिम में सोन नदी में मिल जाती है। औरंगा और अमानत इसकी मुख्य सहायक नदिया हैं। उत्तर कोयल का जलग्रह क्षेत्रफल ९१०० वर्ग किलोमीटर का है और यह पलामू टाइगर रिज़र्व और बेतला नेशनल पार्क से हो कर गुजरती है। मानसून में नदी का बहाव तेज हो जाता है और बरसात के बाद कम। इसीलिए इस नदी के जलग्रह क्षेत्र में सूखे की समस्या भी हो जाती है। पठारी क्षेत्र होने की वजह से भूमिगत जल निकालना मुश्किल होता है और इसलिए किसानों के लिए सिंचाई के अन्य साधन भी मुश्किल हो जाते है। सिंचाई की समस्या बिहार के मगध प्रमंडल में भी होती है जिसमे पांच जिले - औरंगाबाद, गया, नवादा, अरवल, और जहानाबाद, भी प्रभावित होती है। इन मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए १९७० में लातेहार जिले के मंडल गाँव में उत्तर कोयल बाँध परियोजना को मंजूरी मिली।
                                                                                         प्रस्तावित परियोजना में बाँध की उचाई ६७.८ मीटर और लम्बाई ४०८.५ मीटर होनी थी। इसके अलावा मोहमददगंज के पास बराज और उस बराज के दाहिने और बाए बड़ी नहर के निर्माण कार्य भी इसी परियोजना के हिस्सा बने। शुरूआती तौर पे मात्र ३० करोड़ की लागत से बनने वाला यह परियोजना १९७२ में शुरू हुआ और १९९३ में बीच में ही रुक गया। इस परियोजना में प्रस्तावित उचाई देश के पहले टाइगर रिज़र्व पलामू टाइगर रिज़र्व के ६००० हेक्टेयर भूभाग, जिसमे उसका मूल क्षेत्र भी आता है, को जलमग्न कर रहा था। उस क्षेत्र के १३ गाँव को विस्थापित करने का प्रस्ताव भी था जो जलमग्न होने वाले थे। इन्ही कारणों की वजह से तत्कालीन बिहार (उस समय झारखण्ड बिहार का अंग था) वन एवं पर्यावरण विभाग की आपत्ति के बाद काम रुक गया। झारखण्ड अलग होने के बाद तो यह दो राज्यों के मध्य एक जटिल अंतरीराज्यीय जल विवाद में तब्दील हो गया। लगभग २३ वर्षो तक किसी भी सरकार ने इस विवाद को सुलझाने की गंभीर प्रयास नहीं किये। कारण मुख्यतः राजनितिक ही थे। बिहार और झारखण्ड के बटवारे के बाद हमेशा दोनों राज्यों में प्रतिद्वंद्वियों के पास ही सत्ता रही है। जब झारखण्ड भाजपा शाषित होता था तो बिहार में राजद की सरकार और जब बिहार में भाजपा और उसके सहयोगी दल सरकार में होते थे तो झारखण्ड में विरोदी दल की सरकार। अगर थोड़े समय के लिए दोनों प्रदेशो में एक ही दल की सरकार बनी भी, तो केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार थी। चुकी पलामू टाइगर रिज़र्व और बेतला राष्ट्रीय उद्धान के भूभाग के जलमग्न होने का मामला भी था, इसलिए यह परियोजना दोनों राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के समन्वय से ही पूरा हो सकता था। परन्तु, राजनितिक अकर्मण्यता के कारण न ये परियोजना दुबारा शुरू होती दिखी जिसकी वजह से झारखण्ड और बिहार के किसान सिचाई की सुविधा से वंचित रहे। ज्ञात हो की इस परियोजना के पूर्ण होने के बाद १,१७,२७० हेक्टेयर भूभाग में सिचाई की सुविधा मिलती जिसमे झारखण्ड के १२,४७० हेक्टेयर और बिहार के १,११,८०० हेक्टेयर खेतों को फायदा मिलता। अभी तक हुए कार्य की वजह से बिहार के ५०,००० हेक्टेयर और झारखण्ड के मात्र ६०४५ हेक्टेयर खेतों तक सिचाई की सुविधा पहुंची है।
                                                                            सिंचाई की सुविधा किसानो तक न पहुंचने का इस इलाके पर बहुत असर पड़ा है। पलामू और उस से सटे बिहार के औरंगाबाद जिले देश के अति पिछड़े जिलों की श्रेणी में आते है। चुकी ये इलाके कृषि आधारित इलाके है, सिचाई की सुविधा नहीं मिलने पर खेती मानसून आधारित है। मानसून के थोड़ा भी इधर उधर होने पर फसल चौपट हो जाती है। उसपर से खेती भी एकफसला है अर्थात पुरे साल में सिर्फ एक फसल उपजती है। इस वजह से अधिकतर किसान गरीबी रेखा के नीचे है। पानी की कमी के वजह से इंडस्ट्री भी नहीं लग पायी है। चुकी इन इलाकों की औसतन प्रति व्यक्ति आय कम है, व्यापार भी कुछ खास विकसित नहीं कर पाया है। ऐसे में इन इलाकों में विकास अत्यंत धीमी गति से होता रहा है। यही अगर ये परियोजना पूर्ण हो जाती, तब मंजर अलग होता। कृषि समृद्ध होती, किसानो के हाथ में पैसा आता, व्यापर बढ़ता और इसी के साथ विकास की गाडी भी तेज रफ़्तार पकड़ती। ऐसा नहीं हो पाया तो इसके पीछे राजनितिक व्यवस्था ही जिम्मेदार थी।
                                       नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पे विशेष बल दिया गया है। इसलिए, २०१५-१६ में इस परियोजना को दुबारा शुरू करने के प्रयास प्रारम्भ कर दिए गए। वन एवं पर्यावरण विभाग और स्थानीय प्रभावित लोगों के आपत्तियों को सुलझाने का प्रयास प्रारम्भ हुआ। मोदी सरकार ने बाँध की क्षमता को ३६७ मीटर से काम कर ३४१ मीटर कर दी जिससे पलामू टाइगर रिज़र्व के संभावित जलमग्न क्षेत्र ६००० हेक्टेयर से काम हो कर १००० हेक्टेयर हो गया। इस तरह देश के सबसे पहले टाइगर रिज़र्व का मूल भूभाग जलमग्न होने से बच गया। विस्थापित होने वाले गाँव की संख्या भी १३ से कम हो कर बस ८ रह गयी। सर्वोच्च न्यायलय अधिकृत कमिटी और वन एवं पर्यावरण विभाग से प्रस्ताव पारित करने के लिए उनके जरुरी शर्तो को मंजूरी दी गयी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण था की जलमग्न वन और पर्यावरण भूभाग का दुगना हिस्सा में वन लगाना होगा। उसके लिए पलामू टाइगर रिज़र्व और बेतला राष्ट्रीय उधान के आस पास की जमीनों को अधिकृत किया जा चूका है। मोदी मंत्रिमंडल ने १६२२.२७ करोड़ रुपये इस परियोजना के पूर्ण करने के लिए आवंटित कर दिए है जिसमे से १३७८.६१ करोड़ केंद्र सरकार अकेले वहन करेगी। बाकी बचे लागत में बिहार सरकार २१२.४३ करोड़ और झारखण्ड सरकार ३१.२३ करोड़ देगी। नए प्रस्ताव में यह परियोजना कुल १,११,५२१ हेक्टेयर भूभाग पर सिचाई लाभ देगी जिसमे से ९१,९१७ हेक्टेयर बिहार में हैं और १९,६०४ हेक्टेयर झारखण्ड में हैं। झारखण्ड के गढ़वा, डाल्टेनगंज और पलामू के अन्य इलाकों के साथ साथ बिहार के औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, और अरवल के खेतों ताल  उत्तरी कोयल का पानी पहुंच पायेगा जिससे फसल उत्पादन बढ़ेगी और इन इलाकों की आर्थिक स्तिथि सुधरेगी।
                                       कुल मिलाकर देखा जाये तो ये कहना अतिशोय्क्ति नहीं होगा की कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों की उपेक्षा ही इस परियोजना को ठन्डे बस्ते में डाले रखी जिससे इस परियोजना का लागत मूल्य मात्र ३० करोड़ रुपये से बढ़ कर २४०० करोड़ तक पहुंच गया। आखिर इस कदर बढे मूल्य का भुगतान भारतीय नागरिक ही तो कर रहे है। इसके साथ ही इतने दिनों तक सिचाई से वंचित रखकर किसानो और व्यापारियों का जो नुक्सान हुआ है, उसका आकलन करना अपने आप में एक मुश्किल काम है। अगर उस नुक्सान को भी इस परियोजना के लागत मूल्य में जोड़ दिया जाये तो इसकी कीमत ५०,००० करोड़ को भी पार कर सकती है। विडंबना तो यही है की इस तरीके से किसानो का नुक्सान करने के बाद भी कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टिया किसान हितैषी होने का ढोंग करती आयीं है। अब वक्त आ गया है की विधि व्यवस्था में ऐसी बदलाव की जाये जिससे किसी भी परियोजना के आरम्भ होने के बाद बढ़ने वाला लागत मूल्य उसे विलम्बित करने वालो से वसूला जाये जिससे अनावश्यक विलम्ब न हो और देश को इसका नुक्सान न झेलना पड़े।

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